श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के लिए यह एक बड़ी और राहत भरी उपलब्धि है। कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) शिक्षा को मजबूत करते हुए एमडी–एमएस के तीन नए पाठ्यक्रमों को आधिकारिक रूप से हरी झंडी दे दी गई है। इस मंजूरी के साथ एमडी की कुल 8 सीटें और एमएस की 2 सीटें स्वीकृत की गई हैं।कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आशुतोष सयाना ने जानकारी देते हुए बताया कि पीजी सीटों में बढ़ोतरी से न केवल उत्तराखंड के मेडिकल छात्रों को उच्च शिक्षा के बेहतर अवसर मिलेंगे, बल्कि क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार होगा।उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि फैकल्टी, प्रशासन और शासन के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है। आने वाले समय में मेडिकल कॉलेज को एक सशक्त शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे पूरे गढ़वाल क्षेत्र को लाभ मिलेगा।
श्रीनगर मेडिकल कॉलेज को बड़ी सौगात, पीजी सीटों में हुआ इजाफा
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🙏 राजकीय नर्सिंग कॉलेज डोभ (श्रीकोट) को अब स्वर्गीय अंकिता भंडारी के नाम से जाना जाएगा। नया नाम — स्वर्गीय अंकिता भंडारी राजकीय नर्सिंग कॉलेज डोभ (श्रीकोट), पौड़ी गढ़वाल।
न्यू टिहरी में सुरक्षा नियम या इंसानियत पर सवाल? पेट्रोल पंप से 100 मीटर पहले बंद हुई गाड़ी, बोतल में पेट्रोल देने से इनकार
न्यू टिहरी से एक अहम सवाल सामने आया है—क्या सुरक्षा के नाम पर बनाए गए नियम अब आम जनता के लिए परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं? हाल ही में न्यू टिहरी में SDM द्वारा आदेश जारी किया गया कि बिना हेलमेट और बोतल में पेट्रोल-डीज़ल देने पर पूरी तरह रोक रहेगी। प्रशासन का कहना है कि यह फैसला सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह आदेश अब कई सवाल खड़े कर रहा है।आज शाम करीब 7 बजे एक व्यक्ति अपनी पत्नी और छोटी बेटी के साथ यात्रा कर रहा था। उनकी गाड़ी ईंधन रिज़र्व में थी और वे सीधे पेट्रोल पंप की ओर ही जा रहे थे, लेकिन दुर्भाग्यवश पेट्रोल पंप से मात्र 100 मीटर पहले ही गाड़ी का ईंधन पूरी तरह खत्म हो गया। गाड़ी पेट्रोल पंप के बिल्कुल नज़दीक खड़ी थी, इसके बावजूद पेट्रोल पंप पर मौजूद कर्मचारियों ने बोतल में पेट्रोल देने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि SDM के आदेश के तहत बोतल में पेट्रोल देना पूरी तरह प्रतिबंधित है।यह स्थिति इसलिए भी गंभीर थी क्योंकि गाड़ी रिज़र्व में थी, परिवार पेट्रोल पंप की ओर ही बढ़ रहा था, साथ में महिला और छोटी बच्ची मौजूद थीं और समय भी शाम का था, जब अंधेरा होने वाला था। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर गाड़ी पेट्रोल पंप से 100 मीटर नहीं, बल्कि 1 या 2 किलोमीटर दूर बंद होती, या कोई सुनसान सड़क या जंगल का इलाका होता, तो उस परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेता? क्या हर व्यक्ति गाड़ी को धक्का मारकर पेट्रोल पंप तक पहुंचा सकता है?हालांकि इस मामले में पेट्रोल पंप के कर्मचारियों ने मानवता दिखाते हुए गाड़ी को धक्का लगाकर पंप तक पहुंचाने में मदद की, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार ऐसी मदद मिल पाएगी। बोतल में पेट्रोल न देना भले ही एक नियम हो, लेकिन हर परिस्थिति में यह फैसला व्यावहारिक और मानवीय नहीं लगता। इमरजेंसी जैसी स्थितियों के लिए न तो कोई स्पष्ट छूट तय की गई है और न ही पेट्रोल पंपों के लिए कोई आपात दिशा-निर्देश बनाए गए हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि आपात स्थिति में सीमित मात्रा में पेट्रोल देने की अनुमति होनी चाहिए और पेट्रोल पंपों के लिए एक स्पष्ट इमरजेंसी SOP तय की जानी चाहिए, ताकि किसी परिवार, महिला या बच्चे को परेशानी का सामना न करना पड़े। लोगों का यह भी कहना है कि प्रशासन को ज़मीनी हालात समझते हुए अपने आदेश में व्यावहारिक संशोधन करना चाहिए।यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हर उस आम नागरिक का है जो कभी भी ऐसी स्थिति में फँस सकता है। सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन नियम इतने सख़्त नहीं होने चाहिए कि इंसानियत पीछे छूट जाए। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन इस मुद्दे पर पुनर्विचार करेगा और क्या जनता की आवाज़ को सुना जाएगा।

